किसानी और बाजारी

आज हम उस दुनिया में रहने आ गए है जहाँ हर सामान का मुल्य एक बाहरी आदमी तय करता है। चाहे वो वस्तु रोज़ इस्तेमाल होती हो, महीने मे एक बार इस्तेमाल होती हो या फिर आप उससे दिनभर ही जूडे रहो। आज आप खुद अगर देखो तो जो सामान आप इस्तेमाल कर रहे है उस कि किमत आप नहीं, वो कपंनी तय कर रही है कि आपको कितने मे देना है।

पर अगर सोचा जाए तो किसान ही है जो हमेशा, बाजार पर आश्रित रहता है, चाहे वो बीज़ खरीदना हो, दवाई खरीदना हो, खाद भी चाहिए तो वहा ही जाना है। और सबसे अंत मे जब सबकुछ बन जाता है, फसल निकाल ली जाती है तो बेचने जाने पर बाजार ही बताता है कि आपकी फसल कि कितनी किमत होगी। इसमे भी किसान कुद नही बता सकता कि ये मेरी मेहनत से आई है तो इसका दाम इतना होगा।

भाई यह तो वो बात हुई कि जिसमे कहा जाता है कि एक तरफ कुँआ तो एक तरफ खाई, जिस जगह हो वही खडे रहो।

इस समस्या का निवारण एक पृकार से हो सकता है। जब किसान संगठित हो, और अपना कुद का माल एक साथ रखे और एक साथ बेचे। बेचना भी एक पृकार कि कला है, किस क्वालिटि, कितना भाव, कितना समय ये वो आदमी निश्चित करेगा जिसका माल है। वरना इस पर राजनिति तो होती रहेगी, वादे होते रहेगे और सपने आम जनता को दिखाते रहेगे।



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